मोक्षेश्वरनाथ मंदिर - लालगंज में कुआनो मनोरमा नदी के संगम पर स्थित इस मंदिर पर प्रतिवर्ष चैतपूर्णिमा पर तीन दिन का मेला लगता है। जहां दूर-दूर से श्रद्वालु आते हैं। मंदिर प्राचीन काल का है।रामजन्म की साक्षी बनी थी 'मनोरमा'
त्रेता युग से आस्था का केंद्र बिंदु मनोरमा नदी राम जन्म के निमित्त किए गए पुत्र कामेष्ठी यज्ञ में सहभागिता कर भगवान श्री राम के जन्म एवं मर्यादा काल की साक्षी बनी। तब से अब तक आस्थावानों के लिए पुत्र कामना के साथ-साथ धर्म एवं अर्थ की कामना की पूर्ति के लिए भी मनोरमा पवित्र एवं निर्मल है।
देश विदेश से तमाम लोग पुण्य तिथियों पर यहां आकर स्नान ध्यान तथा यज्ञ आयोजन कर अपनी मनौती मानते हैं। रुद्रायमल में वर्णित कथा के अनुसार बस्ती वन प्रदेश में बहने वाली मनोरमा गंगा का अवतरण त्रेता काल में हुआ।
ऋषि श्रेष्ठ श्रृंगी द्वारा सरयू तीर्थ क्षेत्र से उत्तर दिशा में स्थित मख भूमि में कराए जा रहे दशरथ के पुत्र का कामना यज्ञ में जब पवित्र जल की आवश्यकता पड़ी तो यज्ञ क्षेत्र के पश्चिमी दिशा में स्थित टिकरी वन प्रदेश में भगवत भक्ति में लीन ऋषि उद्दालक ने अपने कनिष्ठा अंगुली के नख से पृथ्वी पर एक रेखा खींचकर मां गंगा का आह्वान किया।
दो नदियों का होता है संगम
चैत्र पूर्णिमा के दिन मां गंगा उसी स्थल से निर्मल एवं अविरल धारा के रूप में अवतरित होते हुए बस्ती जिले के तमाम धार्मिक स्थलों से बहते हुए संगम स्थल लालगंज में जाकर कुआनो व सरयू नदी में मिलती हैं।
मनोरमा के तट पर जिले की सीमा पर नकटेश्वर धाम नागपुर सम्मय स्थल मखौड़ा धाम रामरेखा मंदिर हनुमान बाग चकोही एवं लालगंज का पवित्र मंदिर आदि स्थित है। यहां श्रद्धालु पूजन अर्चन एवं तर्पण का कार्यक्रम करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार मनोरमा दुनिया की एक मात्र नदी हैं, जिनके दर्शन, मज्जन, पान से मनुष्य के मनसा पाप का अंत हो जाता है।
मनोरमा कुआनो के संगम पर लगेगा मेला
महर्षि उद्दालक मुनि की तपो भूमि और मनोरमा कुआनों के संगम तट पर लालगंज में हर वर्ष मेले का आयोजन होता है। पांच दिनों तक चलने वाले इस मेले में प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु आते हैं। संगम तट पर स्नान-दान का अपना अलग की महत्व है। पौराणिक मान्यता है कि इस तट पर स्नान कर दान देने से पाप का नाश होता है। पूर्णमासी से एक दिन पूर्व चतुर्दशी शाम को श्रद्धालु घाट के किनारों पर लिट्टी-चोखे का सेवन कर सुबह स्नान-दान करते हैं। श्रद्धालु पांच दिनों तक मेले का आनंद लेते हैं। चैत्र पूर्णिमा से शुरू होने वाले इस मेले में शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोगों का जमावड़ा होने लगा है।
बताया जाता है कि चैत पूर्णिमा, परुवा और द्वितीया को मेला का विशेष महत्व है। श्रद्धालु तीनों दिन संगम में स्नान कर दान-पुण्य करते हैं।
@abhishek


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